ऐ ज़िंदगी…आ हिसाब करें

ए ज़िंदगी

आ बैठ तुझसे कुछ बात करे

आज तुझसे तेरा ही हिसाब करे

कहते चार दिन की तेरी उमर हैं ..पर बहुत बड़ी तू सौदागर हैं

बहुत ख़ुशी बहुत ग़म दिए हैं ..मेरी होकर मुझसे ही सौदे किए हैं

कहते लिखा हैं पहले से तुझमें सब ..और तू एक खुली किताब हैं 

क्या खोना हैं क्या पाना हैं ..सब लिखा लिखाया हिसाब हैं

काश , ज़िंदगी तू सचमुच एक किताब होती

..खोने पाने के जमा खर्च का हिसाब होती

और पढ़ सकता मैं कि आगे क्या क्या होगा

कौन छोड़ जाएगा और कौन कौन मेरा होगा

क्या पाऊँगा मैं और दिल क्या क्या खोएगा

कब मिलेंगी ख़ुशियाँ दिल कब कब रोएगा

फाड़ सकता वो लम्हे जिसने मुझे रुलाया हैं

जोड़ देता वो कुछ पन्ने जिसने मुझे हँसाया हैं

वक्त से आँखे चुराकर मैं भी पीछे चला जाता

टूटे सपनो को एक बार फिर अरमानो से सजाता

छूट गया प्यार जो रिश्तों में..उनके फिर से मैं निभाता

रूठ गये थे मुझसे कुछ पल.. उनको बैठ मैं समझाता

कहना तो तुझसे बहुत कुछ हैं ..पर छोड़ अब कोई गिला नहीं

तूने जो मुझको दे दिया हैं ..बहुतो को वो भी मिला नहीं  

जैसी भी है मेरी ज़िंदगी हैं तू .. तुझे धीरे धीरे पढ़ लेंगे

चल जी लेने दे अब दिल से तुझको..हिसाब फिर किसी दिन कर लेंगे   

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