ग़ज़ल

अपने में खुद को खोजते इक उम्र ढल गई,

साँसों की कश्मकश में शिराऐं भी गल गईं।

हैं लाल रोशनी में नहाई सड़कें तमाम रात,

न जाने कितने हादसे गलियाँ निगल गईं।

पूजूँगा कोई पत्थर बस इतनी मुराद थी,

देखा तो अपने वास्ते चट्टान हिल गईं।

सामने मरुथल है ये चला था सोचकर,

लेकिन ये क्या इसमें भी शाखें निकल गईं।

अब दूब का उगना भी गवारा नहीं उसे,

देखो वो उस पेड़ की छाया से जल गई।

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