जलतरंगिनी

पवन के टंडे

झोंकों के स्पर्श से

मुस्कुराते चल पड़ी वह नदी

उसके संग होले होले

जंगल में हर्ष से

झूमती जा रही यह  पावनी ….

अंजाने में अगर मुलाकात

पत्थर से हुई तो, उससे प्यार से

मीठी बातें करती चली ये मानिनी….

तट पे मिले हंसों से

बलकाती हुई नजरों से

पिया से मिलने की खबर कहती लहराते हुए चली ये सजनी….

सागर से मिलने

हजारों उमंग लिए दिल में

उछल पुतलकर पहाडों से गिरती यह पानिनी…..

राह में मिले अपनों के

दर्द से होकर दुःखी, उनके

तृण तृप्त करने हेत्तु बनी है यह जीवनी……..

सहकर अनेक काँटे

समस्त लोक के पेठ भरने

सबको ललचाती चली है जलतरंगिनी…

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