दूर निकल आया हूँ

ढूँढते ढूँढते किसी को खुद कों खो आया हूँ

..चलते चलते मैं बहुत दूर निकल आया हूँ

…चले तो थे ऐसे के जल्द लौट आएँगे

वापस आकर फिर से आशियाँ सजाएँगे

सजाते सजाते एक आशियाँ उजाड़ आया हूँ

चलते चलते मैं बहुत दूर निकल आया हूँ

मंज़िल से निकला था मंज़िल ही ढूँढने

उजाले में निकला था उजाला ही ढूँढने

साँझ ढली तो देखा कही परछाई छोड़ आया हूँ

चलते चलते मैं बहुत दूर निकल आया हूँ

मुस्कराहट की तलाश में हँसना ही भूल गया

सपनो की ज़िद में मैं सोना ही भूल गया

चंद काग़ज़ के लिए सुनहरे रिश्ते तोड़ आया हूँ चलते चलते मैं बहुत दूर निकल आया हूँ

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