प्रकृति और विनाश

ईश्वर की सुन्दर कृति यह धरा

ईश्वर की सुन्दरतम कृति इस धरा पर प्रकृति

ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति इस धरा पर मानव

धरा प्रकृति मानव इस जगत का सुन्दर स्वरूप

तीनों से महकता इस जगत का रूप

आज धरा है उदास

आज प्रकृति है उग्र, आज मान है बंदी

धरा प्रकृति मानव का संतुलन आज भ्रष्ट

तभी तो मानव हो रहा अपने ही कर्मों से नष्ट

प्रकृति मूक भाषा में कहती रही

मत करो मुझे रूष्ठ, नहीं तो जीवन में बढ़ जाएँगे तेरे कष्ट

आँखे बंद कर बैठा मानव

प्रकृति शांत रूप में सब कुछ देखती रही

आज प्रकृति का ऐसा कहर बरपा

मानव समस्त साधनों से संपूर्ण होकर भी

कैद होने को मजबूर हो बैठा

मानव मान बैठा समस्त गगन मेरा जहान

अंधी दौड़ में हो गया आज बेजान

है मानव आज घूट-घूट कर जी रहा

प्राणवायु भी कृत्रिम साधनों से लेने पर मजबूर हो रहा

प्रकृति का ऐसा कहर बरस रहा

प्राणों की भीख मानव माँग रहा

प्रकृति आज हिसाब मांग रही

प्रकृति आज अपना वास्तविक स्वरूप मांग रही

प्रकृति आज संपूर्ण रूप को प्राप्त करना चाहती

तभी तो मानव की ऐसी दुर्दशा हो रही

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