रँगा सियार आया है…

भेष नया है, नए प्लान ले के आया है

लौटके फिर वही रँगा सियार आया है।।

स्कूल-कॉलेज औ ऑफिसों के अहाते में

फोटो खिंचवाते हुए पौध एक लगाया है।।

शहर है जख्मी और सड़कें हैं भरे गड्ढों से

वादा किया था,बाद पांच साल आया है।।

माल वहीं हजम,झोपड़ ने खाया कुछ भी नहीं

बिन खाए करें, शौचालय तो बनवाया है।।

अब तो मोबाइल औ कम्प्यूटर भी बांट दिए

पेट काट रुंगु ने रिचार्ज भी कराया है।।

जो उनके रंग में रँगे,फ्री टिकिट में घूमे जहां

सिपाही-सीमा बस टिकिट खरीद आया है।।

तोप-चारा-विमान-पूल,सुना है खाते थे…

अब आवास और टॉयलेट का सफाया है!!

भूख-बीमारी-सूखा-बाढ़ से मरते गांवों

मंच-माइक में वो शेखी बघार आया है!!

व्होट पाने-नोट खाने की है आदत जो लगी

योजनाएं बना के जनता को भरमाया है।।

पगडंडी में पसारे है पांव पतझर ने

राजधानी में देखो तो बसन्त आया है!!

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