संघर्ष और नदी

नदियाँ बहती समन्दर में जा मिलती नदियाँ बहती बहुत सन्देश दे जाती नदियाँ बहती संघर्ष गाथा प्रस्तुत करती नदियाँ बहती निस्वार्थ प्रेम गान भरती नदी से पूछो क्यों बहती ? नदी से पूछो क्या कहती ? नदी से पूछो कितना संघर्ष जीवन पथ में नदी से पूछो कितना प्रेम समन्दर से नदी की नियति ही …

बाबू जी और माँ…

मेरी आमद ये तन-मन जान मेरे बाबू जी और माँ, मेरी इज्जत मेरा सम्मान  मेरे बाबू जी और माँ।। मेरे भोजन-वसन-सामान मेरे बाबू जी ओर मां, जीवन-खेल के मैदान मेरे बाबू जी और माँ। ठोकर जब लगी तो वो दवा भी और दुवा भी थे धड़कन-सांसो पर अहसान मेरे बाबू जी और माँ।। निडर-दुस्साहसी,पल में …

वचन बेच दिया उसने…

तन बेच दिया उसने, मन बेच दिया उसने धन-सत्ता के लिए तो,अमन बेच दिया उसने…! अवाम को क्या क्या नहीं वादे किए थे,सारे दौलत औ हुकूमत को, वचन बेच दिया उसने….! सिपाही भेज सरहद,दुश्मन को खबर दे दी जयचंद घर का भेदी,वतन बेच दिया उसने…! ताल- नदी -सड़कें-जंगल न रहे बाकी सेठों से नकद लेके,चमन …

विरही गजल

जब हम साथ होंगे,……..चाँद-तारे मुस्कुराएंगे विरह में बीते-दिन-भीगी-गजल तुमको सुनाएंगे।। तड़प कर गीत-सागर, उखड़ती सांसो ने जो लिखे सीने से लगा, तफ़सील से….. गिन-गिन पढ़ाएंगे ।। हमारे बिन न रह पाने की तकलीफ.तुम बता देना तुम्हारे बिन गुजारे …सिसकते दिन हम बताएंगे।। बिन मेरे गुजारी दिन औ रातें,तुम लिपट कहना अधर पर रख अधर, वो …

तिरँगे के खातिर मरा कीजिये..

कभी जल्दी नहीं फैसला कीजिये कुछ समय सोच कर, तब कहा कीजिये।। जब भी मुश्किल घड़ी सर पे मंडराए तो बुजुर्गों से तब…. मशवरा कीजिये।। देश की बात हो…घर मे आपात हो खुद न कर…माँ-पिता का कहा कीजिये।। दिल मायूस हो जब …कोई पीर हो सौंप कर के खुदा को..रहा कीजिये।। जीस्त के दिन हैं …

एक ब्यंग्य ‘‘होरी‘‘

होरी आयो, होरी आयो, होरी आयो रे नमो बरसा दो रंग गुलाल बजट में, होरी आयो रे भूपे.. बरसा दो भंग-गुलाल बजट में, होरी आयो रे।। अबकी होरि तुम रंग भीगो, फीको देश महान रे आपणो हिस्सों खीर-मलाई, बांटो छाछ जहान रे बड़े बड़े आश्वाशन-भाषण मन भरमायो रे।।बजट में।। आदिवासी-गांव-शहर के हिस्सों में आश्वाशन आयो …

रँगा सियार आया है…

भेष नया है, नए प्लान ले के आया है लौटके फिर वही रँगा सियार आया है।। स्कूल-कॉलेज औ ऑफिसों के अहाते में फोटो खिंचवाते हुए पौध एक लगाया है।। शहर है जख्मी और सड़कें हैं भरे गड्ढों से वादा किया था,बाद पांच साल आया है।। माल वहीं हजम,झोपड़ ने खाया कुछ भी नहीं बिन खाए …

कोरोना का जहर

कोरोना की जहर चली है रोग-मौत से‘‘कैद‘‘भली है। कौन डगर में निकले बच्चू सड़क-पुलिस की लट्ठ खुली है। सरहद सेना-सड़क सिपाही घर में जीवन फली-फूली है। मीत-प्रीत सब दूर हुए हैं संबंधों की तंग गली है…। मानवता मुस्काती है अब मन्दिर-मस्जिद-दान…खुली हैं। सब जन‘‘बन्द‘‘स्वीकार करें तो कोरोना की ….उम्र ढली है। मुंह मे माश्क,हाथो दास्ताने …

ग़ज़ल

अपने में खुद को खोजते इक उम्र ढल गई, साँसों की कश्मकश में शिराऐं भी गल गईं। हैं लाल रोशनी में नहाई सड़कें तमाम रात, न जाने कितने हादसे गलियाँ निगल गईं। पूजूँगा कोई पत्थर बस इतनी मुराद थी, देखा तो अपने वास्ते चट्टान हिल गईं। सामने मरुथल है ये चला था सोचकर, लेकिन ये …

ग़ज़ल

नेकी को दरिया में फैंकने चला गया, रिश्तों को बाजार में बेचने चला गया। रात की उलझन सुलझाऊँ  किस तरह, गुजरा किधर से चाँद देखने चला गया। पपड़ाई हैं क्यों तुम्हारी झील सी आँखें, संशय भरी दरार कुरेदने चला गया। बुनी हुई धुँए से ये आकाश की चादर, ये उन्वान भरे नक्षत्र घेरने चला गया। …