देवेन्द्र कुमार चौहान

प्रकृति और विनाश

ईश्वर की सुन्दर कृति यह धरा ईश्वर की सुन्दरतम कृति इस धरा पर प्रकृति ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति इस धरा पर मानव धरा प्रकृति मानव इस जगत का सुन्दर स्वरूप तीनों से महकता इस जगत का रूप आज धरा है उदास आज प्रकृति है उग्र, आज मान है बंदी धरा प्रकृति मानव का संतुलन आज …

आदर्श और जीवन

सुन्दर यह धरा, सुन्दर चराचर जगत सुन्दर जगत की हर रचना, सुन्दर इस धरा का हर धाम सुन्दर व्यक्तित्व से आदर्श से भरा पड़ा यह सुन्दर जहान कौन कहता इस जीवन में इस जगत में कुछ नहीं जीवन में यहीं संभावनाएं भी, यहीं कल्पना भी यहीं आदर्श भी, यहीं यथार्थ भी और यहीं अन्तिम सार …

स्वयं की तलाश

जीवन क्या अपनी तलाश जीवन क्या अपनी खोज अपनी तलाश में बैठा तो पाया जीवन तलाश का ही पर्याय जीवन तो सीमित कार्यक्षेत्र असीमित जिस-जिस क्षेत्र में मानव पग धरता वह क्षेत्र मानव का कर्म क्षेत्र, वह क्षेत्र मानव की रंगभूमि रंगभूमि जहाँ मानव अपना अभिनय प्रस्तुत कर कर्मक्षेत्र में रंगभूमि में मानव को होती …

मानवता

ईश्वर की सुन्दर कृति मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव ईश्वर की कल्पना की सुन्दर आकृति मानव मानव की आत्मा मानवता ईश्वर की मानव से निज सर्वश्रेष्ठ कृति से एक ही अभिलाषा मानवता मानवता दया का करूणा का प्रेम का सुन्दर भाव मानवता जीवन का अस्तित्व का मूल आधार जया दया जहां करूणा जहाँ प्रेम …

संतोष

संतोष क्या ? संतोष शून्य हो जाना संतोष क्या ? संतोष स्वयं को जान लेना संतोष क्या ? संतोष यर्थाथ को समझ लेना हो जाता मानव जब स्वयं में शून्य हो जाता जब साक्षात्कार सत्य से हो जाता जब साक्षात्कार ईश्वरीय प्रेम से वो संतोष। तृप्ति ही संतोष इच्छाओं का शून्य हो जाना संतोष भावनाओं …

चिंतन और जीवन

चिंतन जीवन का सुन्दर सार चिंतन जीवन का सुन्दर उपहार चिंतन जीवन की मनमोहक सुगंध चिंतन सबल जीवन का आधार चिंतन से निज परिचय, चिन्तन से आस्था चिंतन से ही मनोबल, चिंतन से ही विजय पराजय जीवन का पड़ाव जब सहम जाता जब अकेलेपन में डूब जाता तब चिंतन ही जीवन को सही दिशा देता …

संघर्ष और नदी

नदियाँ बहती समन्दर में जा मिलती नदियाँ बहती बहुत सन्देश दे जाती नदियाँ बहती संघर्ष गाथा प्रस्तुत करती नदियाँ बहती निस्वार्थ प्रेम गान भरती नदी से पूछो क्यों बहती ? नदी से पूछो क्या कहती ? नदी से पूछो कितना संघर्ष जीवन पथ में नदी से पूछो कितना प्रेम समन्दर से नदी की नियति ही …