राजेश कुमार हरित

ग़ज़ल

अपने में खुद को खोजते इक उम्र ढल गई, साँसों की कश्मकश में शिराऐं भी गल गईं। हैं लाल रोशनी में नहाई सड़कें तमाम रात, न जाने कितने हादसे गलियाँ निगल गईं। पूजूँगा कोई पत्थर बस इतनी मुराद थी, देखा तो अपने वास्ते चट्टान हिल गईं। सामने मरुथल है ये चला था सोचकर, लेकिन ये …

ग़ज़ल

नेकी को दरिया में फैंकने चला गया, रिश्तों को बाजार में बेचने चला गया। रात की उलझन सुलझाऊँ  किस तरह, गुजरा किधर से चाँद देखने चला गया। पपड़ाई हैं क्यों तुम्हारी झील सी आँखें, संशय भरी दरार कुरेदने चला गया। बुनी हुई धुँए से ये आकाश की चादर, ये उन्वान भरे नक्षत्र घेरने चला गया। …